पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : बेलि : 1 : 17
बेलि : 1 : 17
अगम काटि गम कियेहु , हो रमैया राम !
शब्द अर्थ :
अगम = असंख्य ! काटि = कोटी , न कम होने वाले , न कटने वाले ! गम = दुखद कृत्य , पाप , दुराचार , अधर्म ! हो रमैया राम = हे राममय साधु संतो !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर बेलि के इस पद में कहते है भाईयों चेतन तत्व राम ने सारासार विचार , अच्छे बुरे की पहचान , धर्म अधर्म की परख करने के लिये प्रग्या बोध का अस्त्र दिया है , ग्यान चक्षु दिये है ! आप विवेक से इन ग्यानेद्रिय का उपयोग कर अधर्म और धर्म में भेद कर सकते हो और पाप कर्म से बच सकते हो ! पर दूर्भाग्य से तुम शिल सदाचार सत्य अहिंसा समता ममता भाईचारा विश्व बंधुत्व वैग्यानिक दृष्टी का धर्म मुलभारतिय हिन्दूधर्म और . सिंधु हिन्दू संस्कृती को छोड कर तुमने विदेशी यूरेशियन वैदिक ब्राह्मणधर्म का वर्णवाद जातिवाद ऊचनिच भेदाभेद छुवाछुत अस्पृष्यता शोषण झूठ मक्कारी विकृती का मार्ग ब्राह्मणवादी वसाहतवादी पुंजीवादी मनुवादी धर्म जो वास्तविक अधर्म और विकृती है उसका पालन किये हो जीस कारण असंख्य पाप तुमने किये है ! इस का परिणाम तुम्हे भूगतना ही पडेगा ! पाप युही नही कटते ! इसलिये तुम्हे विदेशी यूरेशियन वैदिक ब्राह्मणधर्म जो अधर्म है की राह छोड कर सत्य सनातन आद्य आदिवाशी मुलभारतिय लोकधर्म की राह पर चलना होगा !
धर्मविक्रमादित्य कबिरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठाण
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